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Showing posts from June, 2012

आओ लिखें कुछ नया

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आओ लिखें कुछ नया

आओ लिखें कुछ नया, आकांक्षा की स्याही से, नवचेतना के पन्नो पर, कुछ कुरेंदे, कुछ उकेरें, आओ लिखें कुछ नया. आओ लिखें कुछ नया, ऐसा जो बस ऐसा हो, बिलकुल जीवन के जैसा हो, कुछ सुबह, कुछ शाम, आओ लिखें कुछ नया. आओ लिखें कुछ नया, लेखनी स्वतः अपनी राह पकड़ ले, विचार उन्मुक्त हो बह निकलें, कुछ ज़ाहिर, कुछ छिपे, आओ लिखें कुछ नया. आओ लिखें कुछ नया, कि पढ़े तो रस घुल जाए, मानस पटल पर छाप छूट जाए, कुछ धुंधली, कुछ शाश्वत, आओ लिखें कुछ नया. नवीनता तो नियम है, परिवर्तन प्रकृति का सत्य है, लिखेंगे तो लिख ही लेंगे, कुछ नूतन, कुछ चिरन्तन,
आओ लिखें कुछ नया.

मेरा वो छोटा सा घर

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मेरावोछोटासाघर













मेरावोछोटासाघर, दोकमरोंकानन्हासाघर, कहनेकोतोछोटाथामेराघर, लेकिनहमसबऔरबहुतेरेसारे, हँसते,गाते;समाजातेथेउसकीआगोशमें. आजजबमेरेबंगलेमेंएकमेरीअभिलाषा,

ख़ुद की खोज

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ख़ुद की खोज ऑफिस की फाइलों के पीले पन्नों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता खुश्क कागज़ पर काली-नीली स्याही मेरे अस्तित्व का खाका खीच दे. सड़कों के असंख्य गड्डों, छितराए पत्थरों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता किसी ठोकर, कोई झटका मुझे मेरे निज से साक्षात्कार करा दे. शहर के इमारतों के जंगल में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता चटख शीशे, चमकती कांक्रीट से प्रतिवर्तित कोई रौशनी मेरी आकृति का प्रतिबिम्ब दिखा दे. रेल की निष्प्रभ, भावहीन पटरियों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता नदी, पर्वत, रेगिस्तान, बियावान, में मीलों दौड़ती हुई, कहीं किसी ठौर पर मुझे स्वयं से मिला दे. खुद को खोजने की यात्रा नदी से समुद्र में जाते नाविक की तरह जिसे क्षितिज दीखता तो है लेकिन क्षितिज के आगे की दुनिया अबूझ है. खुद को खोजने की यात्रा चौराहे पर खड़े उस पथिक की तरह जिसे पगडण्डी का मोड़ दीखता तो है लेकिन घुमाव के आगे की पहेली अनसुलझी है. खुद की खोज अबूझ दुनिया है, अनसुलझी पहेली है, खुद की खोज. खुद की खोज का सफ़र अनवरत चलता ही रहेगा. संभव है कि इस यात्रा को विराम जीवन के ठहरने के साथ ही मिलेगा.