एक बार फ़िर
एक बार फ़िर एक बार फ़िर, धूल पोछ कर, बाहें चढ़ा कर, लम्बी सांस लेकर, मन चित्त हो कर, एक बार फ़िर. आशाएं पड़ चुकी थीं धूमिल, उम्मीदें गयीं थीं सहम. जोश उड़न-छू हो गया था, जीवट रह गया था मद्धम. जीवन के बहाव में, निढाल उतरा रहे थे. जीवित थे पर मृत्यु सदृश, अनमने ही इतरा रहे थे. राह दिखती तो थी, लेकिन चलने की शक्ति क्षीण थी. सपने पटल पर बनते तो थे, लेकिन बुनने की चाह गौड़ थी. सफलता के वो बीते दिन, ह्रदय को अब झंकृत नहीं करते थे. कामयाबी की खुशबू, मन को अब स्फूर्त नहीं करती थी. लेकिन हाथ कब तक जड़ रहेंगे, निष्काम यूँ ही धरे पड़े रहेंगे. नए दिन, नए सूर्य से आवरण, भला कब तक करते रहेंगे. आकांक्षा के पृष्ठ पर, प्रत्याशा की कूँची से, चलो सपने बुनें, एक बार फिर. एक बार फ़िर, धूल पोछ कर, बाहें चढ़ा कर, लम्बी सांस लेकर, मन चित्त हो कर, एक बार फ़िर.