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ख़ुद की खोज

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ख़ुद की खोज     ऑफिस की फाइलों के पीले पन्नों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता खुश्क कागज़ पर काली-नीली स्याही मेरे अस्तित्व का खाका खीच दे.             सड़कों के असंख्य गड्डों, छितराए पत्थरों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता किसी ठोकर, कोई झटका मुझे मेरे निज से साक्षात्कार करा दे.                 शहर के इमारतों के जंगल में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता चटख शीशे, चमकती कांक्रीट से प्रतिवर्तित कोई रौशनी मेरी आकृति का प्रतिबिम्ब दिखा दे.             रेल की निष्प्रभ, भावहीन पटरियों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता नदी, पर्वत, रेगिस्तान, बियावान, में मीलों दौड़ती हुई, कहीं किसी ठौर पर मुझे स्वयं से मिला दे.               खुद को खोजने की यात्रा नदी से समुद्र में जाते नाविक की तरह जिसे क्षितिज दीखता तो है लेकिन क्षितिज के आगे की द...