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The Perfect Story

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There lived a White Swan in a distant pond
It was a massive pond
The water was misty and the green gorgeous
Then there was also life around him
Friends and family and friends those who were familial
Sunrise was celestial and Sunset was divine too
And it was a Perfect pond.

The White Swan was good at what he did
He was very good at what he planned
All around him depended on his instincts
Many lived to tell tales of his intuition
Many lived ’coz they didn’t die because of him
He was their Messiah
And he was a perfect Saviour.

The White Swan was a vivacious little soul
He had immense might in his breasts
He would burn the water when he trudged ahead
He would beat all
And he would beat them all with time to spare
Such were his strokes and so mighty his strength
That he was a Perfect Champ.

The White Swan had a tender little heart
He found his lady when she had swooned down
Swooned down for a gulp while flying South
She was a maiden from across the mountains
Spotlessly white, hazel eyes, godly beauty
But she…

Like I Do..

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Like I do, when I open my eyes,
When I first ask my mind to think about something nice.
When I lazily flip while still on my bed, When I think of God and see you instead. Like I do, in those first moments of a morning, Do you miss me too?

Like I do, when I plough through the day, When people talk to me and I don't know what they say. When I scribble a formal noting but got no clue, When targets on the charts resemble something like a You. Like I do, in every of those moments of the day, Do you miss me too?

Like I do, when I try to sleep to the best of my ability, When the song you suggested throngs through the midnight tranquility. When I close my eyes and try not to think of you, When you suddenly reappear out of a corner blue. Like I do, when traversing between sleep and sleeplessness Do you miss me too? Like I do..


Lighthouse

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Lighthouse
When you are lost,
Lost somewhere into nowhere.
When the treacherous times,
Have played tricks with you.
The witches of circumstances,
Have pricked you, frightened you.
When the blaze of misfortune,
Has blinded your vision.
Raise your head and look at me,
I will be your Lighthouse. When the grey of life,
Has painted your fate black.
The fluke of destiny,
Has duped you, deceived you.
When the darkness of providence
Has shaded your path gloomy.
Raise your head and look at me,
I will be your Lighthouse. I may be far away,
I may be stiff, stoic,
I may seem powerless,
A little ragged, bruised.
But I have a light,
And so, I will be your lighthouse.

HOPE RISES!!

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HOPE RISES!!



When the birds don’t sing the morning song When the colour of sunrise is not vermilion When the green of the grass loses its tinge When the evil indulge in their own morbid binge Hope rises!!

When the rain doesn’t drench you anymore When the sunshine is bereaved of its radiance galore When the blue of the sky appears a shade impure When the intrigue of a ravine ceases to lure Hope rises!!

When mornings to evenings is a lifeless tourney When life becomes a stale, repetitive journey When the circle of life becomes an oblong When the desire to persist is not so strong Hope rises!!

When you can only laugh but can never smile When you have only slept and not relaxed for a while When you have not danced blithely in the rain When you have not fallen in love again Hope rises!!


सर्वस्व मेरा हुआ

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सर्वस्व मेरा हुआ






आँखें, वो हल्की भूरी, हल्की काली, हल्की खुली, हल्की बंद, खोलती हैं रहस्य सारे, तुम चाहो जितना छिपाना, फिर भी बोलती हैं, बेझिझक, अनवरत.


होंठ, जैसे गुलाबी कमल की, दो उन्मुक्त कोपलें, मिलते हैं,अलग होते हैं, बुलाते हैं,दूर भगाते हैं, तुम कुछ और कहती हो, वो कुछ और बताते हैं. ह्रदय के भेद, परत दर परत खोलते हैं.


मुस्कान, वो अर्ध-चंद्रकार, दोनों तरफ सीधी सिलवटें, उनको स्पर्श करते, गाल के दो 'डिम्पल'. संसार की सारी हंसी, समेटे हुए अपने अन्दर, मेरी सारी ख़ुशी, बटोरे हुए अपने अन्दर. तुम, जिसका सब कुछ, सारा कुछ, अद्वितीय, अद्भुत, स्वार्गिक. तुमको छोड़ते हुए लगता है, भरे दिन में ही अँधेरा हुआ, संतोष है लेकिन, कि आज तक जो था तुम्हारा, आज के बाद सर्वस्व मेरा हुआ.

आओ लिखें कुछ नया

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आओ लिखें कुछ नया

आओ लिखें कुछ नया, आकांक्षा की स्याही से, नवचेतना के पन्नो पर, कुछ कुरेंदे, कुछ उकेरें, आओ लिखें कुछ नया. आओ लिखें कुछ नया, ऐसा जो बस ऐसा हो, बिलकुल जीवन के जैसा हो, कुछ सुबह, कुछ शाम, आओ लिखें कुछ नया. आओ लिखें कुछ नया, लेखनी स्वतः अपनी राह पकड़ ले, विचार उन्मुक्त हो बह निकलें, कुछ ज़ाहिर, कुछ छिपे, आओ लिखें कुछ नया. आओ लिखें कुछ नया, कि पढ़े तो रस घुल जाए, मानस पटल पर छाप छूट जाए, कुछ धुंधली, कुछ शाश्वत, आओ लिखें कुछ नया. नवीनता तो नियम है, परिवर्तन प्रकृति का सत्य है, लिखेंगे तो लिख ही लेंगे, कुछ नूतन, कुछ चिरन्तन,
आओ लिखें कुछ नया.

मेरा वो छोटा सा घर

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मेरावोछोटासाघर













मेरावोछोटासाघर, दोकमरोंकानन्हासाघर, कहनेकोतोछोटाथामेराघर, लेकिनहमसबऔरबहुतेरेसारे, हँसते,गाते;समाजातेथेउसकीआगोशमें. आजजबमेरेबंगलेमेंएकमेरीअभिलाषा,

ख़ुद की खोज

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ख़ुद की खोज ऑफिस की फाइलों के पीले पन्नों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता खुश्क कागज़ पर काली-नीली स्याही मेरे अस्तित्व का खाका खीच दे. सड़कों के असंख्य गड्डों, छितराए पत्थरों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता किसी ठोकर, कोई झटका मुझे मेरे निज से साक्षात्कार करा दे. शहर के इमारतों के जंगल में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता चटख शीशे, चमकती कांक्रीट से प्रतिवर्तित कोई रौशनी मेरी आकृति का प्रतिबिम्ब दिखा दे. रेल की निष्प्रभ, भावहीन पटरियों में मैं खुद को खोजता हूँ. क्या पता नदी, पर्वत, रेगिस्तान, बियावान, में मीलों दौड़ती हुई, कहीं किसी ठौर पर मुझे स्वयं से मिला दे. खुद को खोजने की यात्रा नदी से समुद्र में जाते नाविक की तरह जिसे क्षितिज दीखता तो है लेकिन क्षितिज के आगे की दुनिया अबूझ है. खुद को खोजने की यात्रा चौराहे पर खड़े उस पथिक की तरह जिसे पगडण्डी का मोड़ दीखता तो है लेकिन घुमाव के आगे की पहेली अनसुलझी है. खुद की खोज अबूझ दुनिया है, अनसुलझी पहेली है, खुद की खोज. खुद की खोज का सफ़र अनवरत चलता ही रहेगा. संभव है कि इस यात्रा को विराम जीवन के ठहरने के साथ ही मिलेगा.





वो दिन, क्या दिन!!

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वो दिन, क्या दिन!! बचपन के वो निश्चिन्त दिन, संसार सिमटा हुआ एक टॉफी में, समय उलझा हुआ खेलने में, खाने में, खिलौनों की दुनिया ख़त्म होती नहीं थी, दिन शुरू, दिन ख़त्म, माँ के आँचल में. वो दिन, क्या दिन!! स्कूल के वो लौलीन दिन, बस्ते के अन्दर किताब, कलम और आशा, शरारत के दौर, टीचर ने चाहे जितना तराशा, दोस्ती बनने-टूटने के बीच एक अपना बेस्ट फ्रेंड, माँ ने बोलना सिखाया, लेकिन मातृ भाषा अब थी मित्रभाषा. वो दिन, क्या दिन!! कॉलेज के वो चमकीले दिन, हर दिन एक नया सपना देखती आँखें, आँखों के रस्ते दिल में उतरती उसकी आँखें, आशाओं की सिलेट पर लिखीं सफलता की कहानी, उन्मुक्त मन को कभी क़ैद ना कर पायीं नियमों की सलाखें. वो दिन, क्या दिन!! गृहस्थी के वो जवाबदेह दिन, जिम्मेदारी के बोझ से कंधे झुकते गए, क़र्ज़ के भार से निरंतर दबते चले गए, समरूपता बिठाते, स्वच्छंदता छिनी, बेड़ियाँ कसीं, गृह-बाह्य के कर्तव्यों में उलझते चले गए. वो दिन, क्या दिन!! आजकल बस कटते रहते हैं दिन समय-समाज की नांव पर बहते रहते हैं दिन कभी लगता है क्या ऐसे ही ख़त्म हो जायेंगे मेरे दिन दिन के साथ न्याय नहीं कर पाना प्रतिदिन डरता हूँ यह अवसाद सा…

एक बार फ़िर

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एक बार फ़िर
एक बार फ़िर, धूल पोछ कर, बाहें चढ़ा कर, लम्बी सांस लेकर, मन चित्त हो कर, एक बार फ़िर.

आशाएं पड़ चुकी थीं धूमिल, उम्मीदें गयीं थीं सहम. जोश उड़न-छू हो गया था, जीवट रह गया था मद्धम.

जीवन के बहाव में, निढाल उतरा रहे थे. जीवित थे पर मृत्यु सदृश, अनमने ही इतरा रहे थे.

राह दिखती तो थी, लेकिन चलने की शक्ति क्षीण थी. सपने पटल पर बनते तो थे, लेकिन बुनने की चाह गौड़ थी.

सफलता के वो बीते दिन, ह्रदय को अब झंकृत नहीं करते थे. कामयाबी की खुशबू, मन को अब स्फूर्त नहीं करती थी.

लेकिन हाथ कब तक जड़ रहेंगे, निष्काम यूँ ही धरे पड़े रहेंगे. नए दिन, नए सूर्य से आवरण, भला कब तक करते रहेंगे.

आकांक्षा के पृष्ठ पर, प्रत्याशा की कूँची से, चलो सपने बुनें, एक बार फिर.

एक बार फ़िर, धूल पोछ कर, बाहें चढ़ा कर, लम्बी सांस लेकर, मन चित्त हो कर, एक बार फ़िर.