Wednesday, May 22, 2013

Lighthouse


Lighthouse

When you are lost,
Lost somewhere into nowhere.
When the treacherous times,
Have played tricks with you.
The witches of circumstances,
Have pricked you, frightened you.
When the blaze of misfortune,
Has blinded your vision.
Raise your head and look at me,
I will be your Lighthouse.
When the grey of life,
Has painted your fate black.
The fluke of destiny,
Has duped you, deceived you.
When the darkness of providence
Has shaded your path gloomy.
Raise your head and look at me,
I will be your Lighthouse.
I may be far away,
I may be stiff, stoic,
I may seem powerless,
A little ragged, bruised.
But I have a light,
And so, I will be your 
lighthouse.

Thursday, August 16, 2012

HOPE RISES!!


HOPE RISES!!




When the birds don’t sing the morning song
When the colour of sunrise is not vermilion
When the green of the grass loses its tinge
When the evil indulge in their own morbid binge
Hope rises!!


When the rain doesn’t drench you anymore
When the sunshine is bereaved of its radiance galore
When the blue of the sky appears a shade impure
When the intrigue of a ravine ceases to lure
Hope rises!!


When mornings to evenings is a lifeless tourney
When life becomes a stale, repetitive journey
When the circle of life becomes an oblong
When the desire to persist is not so strong
Hope rises!!


When you can only laugh but can never smile
When you have only slept and not relaxed for a while
When you have not danced blithely in the rain
When you have not fallen in love again
Hope rises!!



Friday, July 6, 2012

सर्वस्व मेरा हुआ

सर्वस्व मेरा हुआ






 
 
आँखें,
वो हल्की भूरी, हल्की काली,
हल्की खुली, हल्की बंद,
खोलती हैं रहस्य सारे,
तुम चाहो जितना छिपाना,
फिर भी बोलती हैं,
बेझिझक, अनवरत.



होंठ,
जैसे गुलाबी कमल की,
दो उन्मुक्त कोपलें,
मिलते हैं,अलग होते हैं,
बुलाते हैं,दूर भगाते हैं,
तुम कुछ और कहती हो,
वो कुछ और बताते हैं.
ह्रदय के भेद,
परत दर परत खोलते हैं.



मुस्कान,
वो अर्ध-चंद्रकार,
दोनों तरफ सीधी सिलवटें,
उनको स्पर्श करते,
गाल के दो 'डिम्पल'.
संसार की सारी हंसी,
समेटे हुए अपने अन्दर,
मेरी सारी ख़ुशी,
बटोरे हुए अपने अन्दर.
 
 
तुम,
जिसका सब कुछ, सारा कुछ,
अद्वितीय, अद्भुत, स्वार्गिक.
तुमको छोड़ते हुए लगता है,
भरे दिन में ही अँधेरा हुआ,
संतोष है लेकिन,
कि आज तक जो था तुम्हारा,
आज के बाद सर्वस्व मेरा हुआ.

Friday, June 22, 2012

आओ लिखें कुछ नया

आओ लिखें कुछ नया



आओ लिखें कुछ नया,
आकांक्षा की स्याही से,
नवचेतना के पन्नो पर,
कुछ कुरेंदे, कुछ उकेरें,
आओ लिखें कुछ नया.
 
 
आओ लिखें कुछ नया,
ऐसा जो बस ऐसा हो,
बिलकुल जीवन के जैसा हो,
कुछ सुबह, कुछ शाम,
आओ लिखें कुछ नया.
 
 
आओ लिखें कुछ नया,
लेखनी स्वतः अपनी राह पकड़ ले,
विचार उन्मुक्त हो बह निकलें,
कुछ ज़ाहिर, कुछ छिपे,
आओ लिखें कुछ नया.
 
 
 
आओ लिखें कुछ नया,
कि पढ़े तो रस घुल जाए,
मानस पटल पर छाप छूट जाए,
कुछ धुंधली, कुछ शाश्वत,
आओ लिखें कुछ नया.
 
 
नवीनता तो नियम है,
परिवर्तन प्रकृति का सत्य है,
लिखेंगे तो लिख ही लेंगे,
कुछ नूतन, कुछ चिरन्तन,
आओ लिखें कुछ नया.
 
 
 
 
 

Monday, June 18, 2012

मेरा वो छोटा सा घर

मेरा वो छोटा सा घर















मेरा वो छोटा सा घर,
दो कमरों का नन्हा सा घर,
कहने को तो छोटा था मेरा घर,
लेकिन हम सब और बहुतेरे सारे,
हँसते, गाते; समा जाते थे उसकी आगोश में.
आज जब मेरे बंगले में एक मेरी अभिलाषा,
समाविष्ट नहीं हो पाती है,
तब याद आता है मुझे मेरा वो छोटा सा घर.




मेरा वो छोटा सा घर,
जब पंखे की हवा मन को शांत कर देती थी,
सुराही का सौंधा पानी शीतलता का उदहारण हुआ करता था.
आज जब मेरे बंगले में फ्रिज और .सी.,
गर्मी को काटने का नाटक करते दिखते हैं,
तब याद आता है मुझे मेरा वो छोटा सा घर.
 
 
 
 
मेरा वो छोटा सा घर,
रंसोई में पकते माँ के हाँथ के खाने की खुशबू,
सुगन्धित करती पूरे घर को, पड़ोस को.
आज जब मेरे बंगले में इत्र की बहुतायत है,
ह्रदय को स्पर्श कर जाए,
ऐसी क्षमता किसी एक खुशबू में भी नहीं है,
तब याद आता है मुझे मेरा वो छोटा सा घर.





मेरा वो छोटा सा घर ,
बिजली गुल होने पर हम तारे गिना करते थे,
हँसते, कहकहे लगाते, गाने गाया करते थे.
आज भी बिजली कटती है,
और जब समय बीतता है समय को कोसने में,
तब याद आता है मुझे मेरा वो छोटा सा घर.
मेरा वो छोटा सा घर,




मेरा वो छोटा सा घर,
दो कमरों का नन्हा सा घर.

Wednesday, June 6, 2012

ख़ुद की खोज

ख़ुद की खोज
 
 
ऑफिस की फाइलों के पीले पन्नों में
मैं खुद को खोजता हूँ.
क्या पता खुश्क कागज़ पर काली-नीली स्याही
मेरे अस्तित्व का खाका खीच दे.
 
 
 
 
 
 
सड़कों के असंख्य गड्डों, छितराए पत्थरों में
मैं खुद को खोजता हूँ.
क्या पता किसी ठोकर, कोई झटका
मुझे मेरे निज से साक्षात्कार करा दे.
 
 
 
 
 
 
 
 
शहर के इमारतों के जंगल में
मैं खुद को खोजता हूँ.
क्या पता चटख शीशे, चमकती कांक्रीट से प्रतिवर्तित
कोई रौशनी मेरी आकृति का प्रतिबिम्ब दिखा दे.
 
 
 
 
 
 
रेल की निष्प्रभ, भावहीन पटरियों में
मैं खुद को खोजता हूँ.
क्या पता नदी, पर्वत, रेगिस्तान, बियावान, में मीलों दौड़ती हुई,
कहीं किसी ठौर पर मुझे स्वयं से मिला दे.
 
 
 
 
 
 
 खुद को खोजने की यात्रा
नदी से समुद्र में जाते नाविक की तरह
जिसे क्षितिज दीखता तो है
लेकिन क्षितिज के आगे की दुनिया अबूझ है.
 
 
 
 
 
 
 
खुद को खोजने की यात्रा
चौराहे पर खड़े उस पथिक की तरह
जिसे पगडण्डी का मोड़ दीखता तो है
लेकिन घुमाव के आगे की पहेली अनसुलझी है.
 
 
 
 
 
 
खुद की खोज अबूझ दुनिया है,
अनसुलझी पहेली है, खुद की खोज.
खुद की खोज का सफ़र
अनवरत चलता ही रहेगा.
संभव है कि इस यात्रा को विराम
जीवन के ठहरने के साथ ही मिलेगा.






Thursday, May 31, 2012

वो दिन, क्या दिन!!

वो दिन, क्या दिन!!
 
 
बचपन के वो निश्चिन्त दिन,
संसार सिमटा हुआ एक टॉफी में,
समय उलझा हुआ खेलने में, खाने में,
खिलौनों की दुनिया ख़त्म होती नहीं थी,
दिन शुरू, दिन ख़त्म, माँ के आँचल में.
वो दिन, क्या दिन!!
 
 
 
 
 
स्कूल के वो लौलीन दिन,
बस्ते के अन्दर किताब, कलम और आशा,
शरारत के दौर, टीचर ने चाहे जितना तराशा,
दोस्ती बनने-टूटने के बीच एक अपना बेस्ट फ्रेंड,
माँ ने बोलना सिखाया, लेकिन मातृ भाषा अब थी मित्रभाषा.
वो दिन, क्या दिन!!
 
 
 
 
कॉलेज के वो चमकीले दिन,
हर दिन एक नया सपना देखती आँखें,
आँखों के रस्ते दिल में उतरती उसकी आँखें,
आशाओं की सिलेट पर लिखीं सफलता की कहानी,
उन्मुक्त मन को कभी क़ैद ना कर पायीं नियमों की सलाखें.
वो दिन, क्या दिन!!
 
 
 
 
 
गृहस्थी के वो जवाबदेह दिन,
जिम्मेदारी के बोझ से कंधे झुकते गए,
क़र्ज़ के भार से निरंतर दबते चले गए,
समरूपता बिठाते, स्वच्छंदता छिनी, बेड़ियाँ कसीं,
गृह-बाह्य के कर्तव्यों में उलझते चले गए. 
वो दिन, क्या दिन!!
 
 
 
 
 
 
आजकल बस कटते रहते हैं दिन
समय-समाज की नांव पर बहते रहते हैं दिन
कभी लगता है क्या ऐसे ही ख़त्म हो जायेंगे मेरे दिन
दिन के साथ न्याय नहीं कर पाना प्रतिदिन
डरता हूँ यह अवसाद सालता रहेगा और कितने दिन
कुंठा लिए हुए ही, क्या मिल जाएगा मुझे मेरा
अंतिम दिन.